भारत में महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षाः राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में
नौशाद हुसैन1, सुनील कुमार गुप्ता2, बनवारी लाल मीणा3
1एसोसिएट प्रोफेसर, कॉलेज ऑफ टीचर एजुकेशन, भोपाल (स्कूल ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद. 500032 तेलंगाना, भारत। ORCID ID: 0000-0001-7530-6686.
2सहायक प्रोफेसर, श्री वैष्णव कॉलेज ऑफ टीचर्स ट्रेनिंग, इंदौर, मध्य प्रदेश-452009, भारत।
3प्रोफेसर, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली, भारत। ORCID ID: 0009-0005-4663-5479.
*Corresponding Author E-mail: nhusain@manuu.edu.in, kanha25sep@gmail.com, blalmeena@gmail.com
ABSTRACT:
भारत सरकार सतत विकास के लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध है, ये एसडीजी सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (MDG) का एक विस्तार है। लैंगिक समानता, महिलाओं के आत्मनिर्णय और सभी के लिए समावेशी, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण उपाय किए हैं। इनमें से सबसे नवीनतम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 है। भारत की एनईपी 2020, जो विशेष रूप से एमडीजी-3; और एसडीजी-4 व 5 के अनुरूप है, ने देश की शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों और व्यापक दृष्टिकोण के लिए सब का ध्यान आकर्षित किया है। एनईपी का लक्ष्य सभी के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देना है, विशेषतः ऐसे समाज में जहां शिक्षा में लैंगिक असमानताएं बनी हुई हैं। यह शिक्षा नीति महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान देती है। प्रस्तुत लेख भारतीय संदर्भ में महिलाओं हेतु न्यायसंगत और समावेशी शिक्षा प्रदान करने में बाधक कारकों और उन के समाधान की रणनीतियों की जांच करता है। यह महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा के संबंध में भारत सरकार द्वारा की गई पहलों की जांच करता है, उन्हें प्रभावित करने वाले कारकों की पहचान कर के उन्हें नियंत्रित करने के लिए रणनीति सुझाता है। इसके अतिरिक्त, यह शिक्षा के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत में विद्यमान लैंगिक असमानताओं की स्थिति पर भी प्रकाश डालता है।
KEYWORDS: सतत विकास के लक्ष्य (SDG), सहस्राब्दी विकास के लक्ष्य (MDG), समतामूलक और समावेशी शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, लैंगिक असमानता ।
प्रस्तावना:-
भारत में महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। भारत में लड़कियों की शिक्षा की गुणवत्ता एक बढ़ती चिंता का विषय है जिसमें सुधार किया जाना चाहिए (द वर्ल्ड बैंक, 2022)। उनके कम नामांकन, सुलभता/सुगमता (Access), प्रतिधारण (Retention) और समतामूलक (Equitable) गुणवत्ता वाली शिक्षा (यादव और सिंह, 2020) के प्रति हमेशा से एक बड़ी चिंता रही है। इस समस्या में अज्ञानता, जागरूकता की कमी, सुरक्षा चिंता, डराने-धमकाने और उत्पीड़न सहित कई कारकों का योगदान है। ये सभी कारक पितृसत्तात्मक (पुरुष प्रधान) समाज की देन हैं (एसआरडी, 2023)। यह समाज, लैंगिक रूढ़िवादिता, गहरी जड़ें जमा चुके सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंडों (यादव और सिंह, 2020), आर्थिक व लैंगिक असमानता (कुक, 2020) से सुदृढ़ होता है। समाज में प्रचलित व्यवस्थित पूर्वाग्रहों ने स्कूलों के साथ-साथ उच्च शिक्षा संस्थानों में लड़कियों के निम्न नामांकन और निम्न प्रतिधारण में योगदान दिया है। हालाँकि लैंगिक समानता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन आधुनिक युग में भी हमारा समाज लैंगिक असमानता का सामना कर रहा है (एसआरडी, 2023)।
हाल के दशकों में लैंगिक असमानता को दूर करने की दिशा में स्पष्ट प्रगति होने के बावजूद, भारत में यह विद्यमान है; विशेष रूप से सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (SEDGs), ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदायों में, जहां लड़कियों से अक्सर घरेलू जिम्मेदारियों को निभाने और देखभाल के कर्तव्यों के कारण शिक्षा का त्याग करने की अपेक्षा की जाती है। इसके अलावा, महिलाओं के मुद्दे जैसे कम उम्र में शादी (यूनिसेफ, 2019; एसआरडी, 2023), लिंग आधारित भेदभाव (यादव और सिंह, 2020), रास्ते में लड़कियों की छेड़खानी, वाहन सुविधाओं की कमी, और स्कूलों में पृथक शौचालय सुविधाओं की कमी, इत्यादि लड़कियों के शैक्षिक अवसरों में और अधिक बाधा डालती हैं। ये सभी कारक लड़कियों को शैक्षिक अवसरों से दूर करने में योगदान करते हैं।
भारत में परंपरागत रूप से लड़कों की शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता है। यदि हम एक लड़के को शिक्षित करते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति को ही शिक्षित कर सकते हैं; और यदि हम एक लड़की को शिक्षित करते हैं, तो उसका पूरा परिवार और उसके बाद की पीढ़ियाँ भी शिक्षित होती हैं, जो समाज और देश के विकास में योगदान देती है। लेकिन भारत में, लड़कियों को शिक्षित करने में कई बाधाएं हैं (द वर्ल्ड बैंक, 2022), खासकर मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के समाजों में, संज्ञान (Cognition) में लैंगिक अंतर और लैंगिक असमानता (जैन और अन्य, 2022); और लड़कियों के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा की सुलभता उनमें प्रमुख हैं, जिन्हें कुशलतापूर्वक समाप्त करने की आवश्यकता है । लड़कियों की शिक्षा की सुलभता में असमानता उनके करियर के अवसरों में भी असमानता पैदा करती है। पितृसत्तात्मक समाज में प्रचलित लैंगिक रूढ़िबद्ध धारणाओं से कैरियर के अवसर गहराई से जुड़े होते हैं। ये सभी कारक सुलभता, नामांकन, प्रतिधारण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण जीवन में लैंगिक असमानता को भी बढ़ाते हैं।
यह सर्वविदित तथ्य है कि सतत विकास लक्ष्यों (SDG) ने अब सहस्राब्दी विकास लक्ष्य MDG (वुडब्रिज, 2015) को प्रतिस्थापित कर दिया है। इन एसडीजी के अनुपालन में भारत सरकार ने इन्हें प्राप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। इसके अतिरिक्त, 2030 तक एसडीजी हासिल करने के प्रयास में, इसने राष्ट्रीय संकेतकों के संदर्भ में प्रत्येक एसडीजी के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं जिनका समय-समय पर डेटा आधारित साक्ष्य (भारत सरकार, 2024अ) के माध्यम से मूल्यांकन किया जाता है। इन 17 एसडीजी में से तीन महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा से संबंधित हैं, अर्थात्ः एमडीजी- 3 लैंगिक समानता को प्रोत्साहन देना और महिलाओं को सशक्त बनाना, एसडीजी- 4 समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करना और सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को प्रोत्साहन देना और एसडीजी- 5 लैंगिक समानता हासिल करना और सभी महिलाओं और लड़कियों को सशक्त बनाना शामिल है। इन लक्ष्यों और एसडीजी को तब तक हासिल नहीं किया जा सकता जब तक हम लड़कियों के लिए समान और समावेशी शिक्षा लागू नहीं करते। इसी प्रकार, वल्देर्रमा रिऑस और अन्य (2023) के निष्कर्षों से स्पष्ट है कि समावेशी नीतियां सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान सुलभता प्रदान करती हैं और शिक्षण प्रथाओं को बढ़ाती हैं। लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण और समावेशी व समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने के अनुरूप, भारत सरकार ने भी अपने नीति कार्यान्वयन के माध्यम से कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। इनमें सबसे अद्यतन है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी, 2020)। अगस्त 2020 में, भारत सरकार ने अपनी बहुप्रतीक्षित नीति एनईपी 2020 का लोकार्पण किया, जिसका लक्ष्य देश की शिक्षा प्रणाली को व्यापक रूप से पुनर्जीवित करना है। इस नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य लिंग, सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि या भौगोलिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी के लिए समान और समावेशी शिक्षा को प्रोत्साहित करना है (पोलट, 2011; यूनेस्को, 2017)। एनईपी 2020 राष्ट्र के शैक्षिक परिदृश्य को बदलने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की रूपरेखा तैयार करती है। जिस के अंतर्गत देश में व्याप्त लैंगिक असमानताओं (एसआरडी, 2023) को संबोधित करने और शिक्षा के माध्यम से महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया है। यह लेख एनईपी 2020 के सन्दर्भ में महिलाओं के लिए समान और समावेशी शिक्षा प्राप्त करने की चुनौतियों, अवसरों और रणनीतियों पर प्रकाश डालता है।
महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा की आवश्यकता:
यह सर्वमान्य है कि, महिलाओं को शैक्षिक रूप से सशक्त बनाकर ज्ञान, प्रशिक्षण, सर्वोत्तम प्रथाओं, दृष्टिकोण, मूल्यों, परंपराओं को पीढ़ियों तक प्रसारित किया जा सकता है। लड़कियों को शिक्षित करके किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त किया जा सकता है व राष्ट्रीय विकास दर को बढ़ाया जा सकता है। तथा गतिशील समाज बनाया जा सकता है। इसमें समुदायों, देशों और पूरी दुनिया को बदलने की क्षमता है (यूनिसेफ, 2019)। लेकिन, भारत में लड़कियों को शिक्षित करना अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लड़कियों को समतामूलक और समावेशी शिक्षा प्रदान करने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है जैसे कि लड़कियों की शिक्षा के प्रति नकारात्मक मनोवृत्ति, लैंगिक पक्षपात, गरीबी, कम उम्र में शादी, हिंसा, उत्पीड़न और लड़कियों की सुरक्षा पर चिंता, स्कूलों तक सुगमता आदि। इस के अतिरक्त, हैलिस साकिज़ और अन्य (2023) के अनुसर शिक्षकों की मनोवृत्ति भी समावेशी शिक्षा के प्रति लिंग और प्रशिक्षण के आधार पर पक्षपातपूर्ण होती है।
यादव और सिंह (2020) के अनुसार भारतीय समाज में शिक्षा के सभी स्तरों पर समतामूलक, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में लैंगिक पक्षपात देखा जाता है। लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करके, हम नई पीढ़ी को अधिक जागरूक और समझदार बना सकते हैं, और समाज में व्याप्त लैंगिक अंतर को कम कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत में व्याप्त लैंगिक पूर्वाग्रह, लिंग-आधारित उत्पीड़न और असमानताओं को मिटाया जा सकता है। महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा समय की मांग है और कई कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनमें से प्रमुख का वर्णन नीचे दिया गया हैः
1. सशक्तिकरणः
शिक्षा महिलाओं को आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करके सशक्त बनाती है और उन्हें आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भाग लेने में सक्षम बनाती है। इसके अतिरिक्त, यह उन्हें अपने स्वास्थ्य, करियर और रिश्तों से संबंधित सूचित निर्णय लेने की आवश्यकता के प्रति जागरूक बनाती है, जिससे नारी स्वायत्तता को प्रोत्साहन मिलता है।
2. लैंगिक समानताः
लैंगिक समानता को अधिकांशतः शिक्षा द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है, जो एक आधारभूत मानव अधिकार है। शिक्षा की समान सुलभता महिलाओं को लिंग के आधार पर भेदभाव के खिलाफ बोलने, अपने अधिकारों की रक्षा करने और लैंगिक समानता में संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने में मदद करने योग्य बनाती है। यह सतत विकास और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देती है (साहू और अन्य, 2018; टेरोन और हजारिका, 2024)।
3. गरीबी उन्मूलनः
किसी भी देश में गरीबी हटाने और उसके आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है। महिलाओं की शिक्षा और कौशल-निर्माण के अवसरों तक सुलभता बढ़ाकर देश गरीबी के अंतर-पीढ़ीगत चक्र को समाप्त कर सकता है और सतत आर्थिक विकास को आगे बढ़ा सकता है।
4. स्वास्थ्य और कल्याणः
महिलाओं की शिक्षा का उनके स्वयं और परिवार के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसमें मातृ मृत्यु दर में कमी, बाल स्वास्थ्य और पालन-पोषण की तकनीकों में वृद्धि और स्वास्थ्य देखभाल संसाधनों तक आसान सुलभता शामिल है। उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं के स्वस्थ व्यवहार अपनाने, आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सा सहायता लेने और अपने प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति सजग निर्णय लेने की अधिक संभावना होती है।
5. सामाजिक सामंजस्यः
सहानुभूति, सहिष्णुता और विविधता के प्रति सम्मान के विकास के माध्यम से समावेशी शिक्षा, सामाजिक एकता और शांति को बढ़ाती है। विभिन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं के पास जब उच्च गुणवत्ता की शिक्षा होती है तो वो अधिक स्वीकार्य और सहिष्णु समाज बनाने, सामाजिक विभाजन को रोकने और समाज में सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करने में मदद कर सकती हैं।
6. शांति और सुरक्षाः
सद् भाव को प्रोत्साहन देने और विवादों व टकरावों को रोकने का एक प्रभावी साधन शिक्षा है। उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त महिलाओं में कट्टरपंथी विचारधाराओं, जो पूर्वाग्रह और हिंसा को बढ़ावा देती हैं, का विरोध करने की अधिक संभावना होती हैं, वे विवादों को शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने का समर्थन करती हैं, और शांति को प्रोत्साहन देने की पहल करती हैं।
7. वैश्विक विकासः
सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने और वैश्विक विकास को आगे बढ़ाने के लिए, महिलाओं को एक समान और समावेशी शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। एक महिला की शिक्षा के द्वारा अपने समुदाय में परिवर्तन का कारक बनने और लैंगिक समानता, स्वास्थ्य और कल्याण को प्रोत्साहन देने और गरीबी उन्मूलन जैसे विकास लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करने की संभावना बढ़ जाती है।
महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा न केवल सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक है, बल्कि व्यक्तिगत सशक्तिकरण, आर्थिक विकास, वैश्विक प्रगति और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उत्प्रेरक भी है (टेरॉन और हजारिका, 2024)। महिलाओं की शिक्षा में निवेश से समाज, अर्थव्यवस्था और भावी पीढ़ियों को कई लाभ मिलते हैं। इसलिए, दुनिया भर के नीति निर्माताओं, शिक्षकों और प्रशासकों को महिलाओं के लिए समतामूलक और समावेशी शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भारतीय शिक्षा में प्रचलित लैंगिक असमानताओं का सिंहावलोकन:
भारत के विभिन्न वंचित वर्गों में लैंगिक असमानता काफी प्रचलित है। यह लैंगिक असमानता साक्षरता दर में स्पष्ट रूप से देखी जाती है (कुक, 2020), जिसमें पुरुष 84% साक्षर हैं और महिलाएं 72% साक्षर हैं (एसआरडी, 2023)। देसाई (2007) के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में शिक्षा के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर यह लैंगिक असमानता क्रमशः 30% और 26% है। यह असमानता कुछ भारतीय राज्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जैसेः पंजाब, हरियाणा, यूपी और बिहार। परिवार की वित्तीय सहायता में वृद्धि से लड़के और लड़कियों दोनों की शाला में उपस्थिति में काफी सुधार होता है। लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिक्षा दर वृद्धि में इस सहायता का लगभग दो गुना अधिक प्रभाव पड़ा। यह लैंगिक अंतर बड़े आयु समूहों में भी व्याप्त है। एनआईए (2023) की एक रिपोर्ट जो 45-90 वर्ष के लोगों पर की गई थी, से पता चलता है कि महिलाओं में निरक्षरता की दर पुरुषों की तुलना में दोगुनी थी। लैंगिक असमानता का मूल कारण गरीबी, बेरोजगारी, रूढ़िवादिता और अशिक्षा है। इनमें सबसे प्रमुख है अशिक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी (एसआरडी, 2023)। चूंकि शिक्षा सामाजिक न्याय, समानता (एनईपी, 2020) और महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहन देने का एकमात्र साधन है, इसलिए यह सुझाव दिया गया कि उच्च स्तर की लैंगिक असमानता वाले राज्यों को इस खाई को भरने के लिए महिलाओं की शिक्षा हेतु और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। क्योंकि, शिक्षा में सामान्य रूप से समाज की स्थिति और विशेष रूप से महिलाओं के बीच जीवन की गुणवत्ता को ऊपर उठाने की शक्ति है (एसआरडी, 2023)। महिलाओं के स्तर और उनके बच्चों में कुपोषण के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध है (विश्व स्वास्थ्य संगठन, 2018)। फिर भी, 15-49 वर्ष आयु वर्ग में, कम से कम 10 वर्ष की स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं का योगदान (41%) पुरुषों (लगभग 50%) की तुलना में 9% कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और दयनीय है, महिलाओं का योगदान लगभग 33% है (राठौड़, 2023)। एसआरडी (2023) के अनुसार, भारत सरकार द्वारा लैंगिक असमानता को कम करने के लिए किए गए गंभीर प्रयासों के बावजूद, हमारा देश अभी भी लैंगिक समानता सूचकांक में पिछड़ा हुआ है।
भारत ने सर्व शिक्षा अभियान और सभी के लिए शिक्षा जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण को प्राप्त करने के लिए आशाजनक पहल की है (देसाई, 2007)। इसके अलावा, लड़कियों के नामांकन और प्रतिधारण को बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा कुछ राज्य विशिष्ट योजनाएं जैसे मुफ्त यूनिफार्म, मुफ्त पाठ्य पुस्तकें, साइकिल (हरियाणा राज्य में) और छात्रवृत्तियां प्रदान की जाती हैं। इसके अलावा, भारत सरकार द्वारा छात्राओं के लिए ब्रिज कोर्स और उपचारात्मक शिक्षा कार्यक्रम भी शुरू किए गए। आठ भारतीय राज्य घोषणा कर चुके हैं कि उन्होंने प्राथमिक स्तर पर लैंगिक समानता हासिल कर ली है। वे लैंगिक समानता लाने के लिए परिस्थितियों को निर्मित कर रहे हैं और सक्षम बना रहे हैं, जिससे लड़कियों के लिए अधिक अनुकूल शैक्षणिक माहौल की ओर कदम बढ़ाया जा सके। भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) कार्यालय द्वारा किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्षों से पता चलता है कि साक्षरता में लैंगिक असमानता वर्ष 2007-08 में 18.2% से घटकर वर्ष 2017-18 में 14.4% हो गई (भारत सरकार, एन.डी.)। ये निष्कर्ष बताते हैं कि भारत में स्थिति बदल रही है।
शैक्षिक नामांकन, प्रतिधारण और उपलब्धि में लैंगिक असमानता को प्रभावित करने वाले सामाजिक व सांस्कृतिक कारक, और आर्थिक बाधाएँ लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच में सार्थक रूप से बाधा डालते हैं। ये बाधाएँ सामाजिक मानदंडों, मान्यताओं और आर्थिक संरचनाओं में दृढ़ता से अंतर्निहित होती हैं, जिससे लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच में बाधा होती है, और उन्हें अपनी शिक्षा पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। पारंपरिक लैंगिक भूमिकाएँ कई समुदायों में लड़कियों और महिलाओं पर भारी बोझ डालती हैं, जिससे वे देखभाल और घरेलू कामकाज के लिए ज़िम्मेदार हो जाती हैं।
इस कारण से, परिवार लड़कियों की तुलना में लड़कों की शिक्षा को अधिक महत्व देते हैं, यह मानते हुए कि लड़कियों की शिक्षा उनके भविष्य के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि जीवनसाथी और परिवार की देखभाल। यह विचारधारा लड़कियों को अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाने से रोकती है और लैंगिक असमानता को बढ़ाती है। लड़कियों की शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण और उनकी शिक्षा के महत्व के प्रति दृष्टिकोण, सांस्कृतिक मानदंडों, लैंगिक भूमिकाओं और समाज में महिलाओं के स्थान से भी काफी प्रभावित होते हैं। लड़कियों की शिक्षा तक सुलभता में अतिरिक्त बाधाएं उस समाज द्वारा पैदा की जाती हैं जो लड़कियों की तुलना में लड़कों की शिक्षा को महत्व देता है, या जो लैंगिक मानदंडों को सुदृढ़ करता है, या जो लड़कियों की स्वायत्तता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रतिबंधित करता है, या जो लड़कियों की क्षमता और क्षमताओं के बारे में नकारात्मक पूर्व धारणाओं को बढ़ावा देता है।
आर्थिक सीमाएँ, जैसे गरीबी और धन की कमी, लड़कियों की शिक्षा में बड़े अवरोध हैं। जो परिवार आर्थिक रूप से संघर्ष करते हैं, उन्हें स्कूल की फीस सहित स्कूल की यूनिफार्म, पाठ्यपुस्तकों, परिवहन और स्कूल से संबंधित व्ययों का भुगतान करना मुश्किल होता है, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा तक सुलभता असमान हो जाती है और लड़कियों की तुलना में लड़कों को प्राथमिकता प्राप्त हो जाती है (यूनिसेफ, 2019)। लड़कियों को स्कूल भेजने में आने वाली उच्च लागत और संभावित श्रम योगदान की खोई हुई मजदूरी के कारण परिवार उनकी शिक्षा का समर्थन करने के प्रति कम इच्छा व्यक्त करते हैं।
इसके अलावा, सुगम स्कूलों और परिवहन के बुनियादी ढांचे की कमी के कारण लड़कियों को दूर और पृथक स्थानों पर स्थित स्कूलों में नियमित रूप से जाना चुनौतीपूर्ण लगता है। स्कूलों में लड़कियों की अनुपस्थिति और स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारण; स्कूल जाने के लिए लंबा रास्ता, सुरक्षा चिंताओं (यादव और सिंह, 2020; द वर्ल्ड बैंक, 2022), उत्पीड़न व हमले के खतरे (यूनिसेफ, 2019); और लिंग आधारित भेदभाव है। जब लड़कियों के लिए स्कूल जाने के सुरक्षित और सुविधाजनक अवसर नहीं होते हैं तो वो अक्सर अपने शैक्षिक प्रयासों में पीछे रह जाती हैं । इन सभी कारकों के कारण स्कूलों में लड़कियों का नामांकन और प्रतिधारण कम होता है; और स्कूलों के सभी स्तरों पर ड्रॉप-आउट दर में वृद्धि होती है। यूनिसेफ (2019) के एक अध्ययन से विदित होता है कि लगभग 119 मिलियन लड़कियों का नामांकन स्कूलों में नहीं हुआ है। इन सभी तथ्यों से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत में महिला शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है। उपलब्ध साहित्य के आधार पर, सुलभता, नामांकन, प्रतिधारण और शैक्षिक उपलब्धि में लैंगिक असमानता को प्रभावित करने प्रमुख कारक निम्नानुसार हैंः
1. सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंड और रूढ़ियाँः
पारंपरिक लैंगिक भूमिकाएँ अक्सर गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और रूढ़ियों द्वारा निर्धारित की जाती हैं, लड़कियों और महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी शिक्षा से पहले पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को प्राथमिकता दें। ये अपेक्षाएँ लड़कियों की शैक्षिक उपलब्धि की आकांक्षाओं और संभावनाओं को सीमित करती हैं, जिससे परिवार अपनी बेटियों में शैक्षिक निवेश करने से हतोत्साहित हो जाते हैं।
2. आर्थिक बाधाएँः
गरीबी और आर्थिक अनिश्चितता के कारण लड़कियों की शिक्षा गंभीर रूप से बाधित होती है। अपने सीमित साधनों के कारण, वित्तीय कठिनाइयों का सामना करने वाले परिवार आमतौर पर लड़कियों की तुलना में लड़कों की शिक्षा पर अधिक जोर देते हैं, जो शिक्षा तक सुलभता में लैंगिक भेदभाव को बढ़ाते है। इसके अतिरिक्त, स्कूल की फीस, यूनिफार्म, परिवहन और आपूर्ति जैसी अप्रत्यक्ष लागतें कम आय वाले परिवारों की लड़कियों के लिए वित्तीय बाधाओं को और बढ़ाती हैं।
3. भौगोलिक सुलभताः
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में, स्कूलों तक सीमित पहुंच, परिवहन सुविधाओं की कमी और स्कूल तक असुरक्षित मार्ग, लड़कियों के स्कूल में दाखिला लेने और जाने की क्षमता में बाधा बनते हैं। आस-पास के स्कूलों की कमी, बोर्डिंग सुविधाओं की कमी, लड़कियों को लंबी दूरी की यात्रा करने में बाधा बनती है, जिससे सुरक्षा जोखिम और शाला त्याग की संभावना बढ़ जाती है।
4. बाल विवाह और उस के परिणामः
बाल विवाह (यूनिसेफ, 2019; कुक, 2020) और कम उम्र में गर्भधारण लड़कियों की शिक्षा में सार्थक बाधाएं हैं; यह लड़कियों के समय से पहले शाला छोड़ने का एक प्रमुख कारण है, विशेषतः उन समुदयों में जहां बाल विवाह प्रचलित है। ऐसी लड़कियों को अक्सर पारिवारिक और देखभाल की जिम्मेदारियों को पूरा करने, अपने शैक्षिक अवसरों को सीमित करने के कारण स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। जिस से गरीबी व लैंगिक असमानता का चक्र निरंतर चलता रहता है।
5. लिंग आधारित हिंसा और उत्पीड़नः
लिंग आधारित हिंसा (यूनिसेफ, 2019) और यौन उत्पीड़न, धमकाना, शारीरिक हमला, भय और हिंसा स्कूल के भीतर और बाहर दोनों जगह प्रतिकूल शिक्षण वातावरण बनाते हैं जो लड़कियों को स्कूल जाने और स्कूल की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने से रोकते हैं। हिंसा के डर से लड़कियाँ असुरक्षित महसूस करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्कूल में कम उपस्थिति और पढ़ाई में उनकी रुचि कम हो जाती है।
6. रोल मॉडल और मार्गदर्शन की कमीः
नेतृत्व की भूमिकाओं वाली महिला रोल मॉडल, जैसे महिला शिक्षक, महिला प्रशासक और स्थानीय महिला नेताओं की कमी लड़कियों की उच्च शिक्षा व करियर की संभावनाओं को आगे बढ़ाने के आत्मविश्वास और आकांक्षाओं को क्षीण कर देती है। इसके अतिरिक्त, पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में लड़कियों के लिए मार्गदर्शन का अभाव और सहायता प्रणालियों की कमी के कारण लड़कियाँ शिक्षा प्राप्त करने में स्वयं को अकेली और हतोत्साहित महसूस करती हैं। यह लड़कियों के नामांकन को कम कर के लैंगिक असमानता में वृद्धि करता है।
7. नीति और संस्थागत बाधाएँः
शैक्षिक प्रणाली में दोषपूर्ण नीतियों, प्रथाओं और संस्थागत मानदंडों के कारण सुलभता, नामांकन, प्रतिधारण और उपलब्धि में लैंगिक विषमता बढ़ जाती है। इनमें लिंग विशेष के प्रति पक्षपातपूर्ण पाठ्यक्रम, मासिक धर्म स्वच्छता के प्रबंधन के लिए अपर्याप्त सुविधाएं, संसाधनों का असमान वितरण और लड़कियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रति उत्तरदायी नीतियों और कार्यक्रमों की कमी सम्मिलित हैं।
लड़कियों की शिक्षा में बाधित सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक कारक परस्पर संबंधित होते हैं। इन जटिल और परस्पर संबंधित कारकों को संबोधित करने के लिए, एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें रूढ़िवादी लैंगिक मानदंडों पर सवाल उठाने, लड़कियों की शिक्षा, छात्रवृत्ति और बुनियादी ढांचे के लिए वित्तीय आवंटन में वृद्धि, उन के लिए शैक्षिक नीतियों में सुधार, उन के अधिकारों और शैक्षिक अवसरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने को प्राथमिकता देने के लिए सरकार, समुदायों और हितधारकों की ओर से ईमानदार प्रयास शामिल हो। समाज लड़कियों की क्षमताओं के संवर्धन में योगदान कर सकता है, लैंगिक समानता निर्मित कर सकता है, और अधिक समतामूलक और समावेशी शिक्षण वातावरण निर्मित कर सकता है जो सभी महिलाओं को उनकी क्षमताओं का एहसास कराने, शिक्षा में लैंगिक असमानताओं के इन अंतर्निहित कारकों से प्रभावी ढंग से निमटने और भारत के सतत विकास में महिलाओं के योगदान करने को सुनिश्चित करता है।
भारत सरकार द्वारा किये गये प्रयास:
भारत सरकार ने एनईपी 2020 को लागू करने से पहले महिला सशक्तिकरण के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम शुरू किए। विशेष रूप से, समग्र शिक्षा अभियान, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय-केजीबीवी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय विद्यालय और छात्रावास, रानी लक्ष्मी बाई आत्मरक्षा प्रशिक्षण, सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान के लिए स्वामी विवेकानन्द सिंगल गर्ल चाइल्ड फ़ेलोशिप, एकल बालिका के लिए पीजी इंदिरा गांधी छात्रवृत्ति, गर्ल्स इंसीनरेटर और सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन, आदि। लेकिन, 21वीं सदी की उदीयमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, अधिक सुलभता, समानता को बढ़ावा देने, शिक्षा के सभी स्तरों पर महिलाओं की शिक्षा की गुणवत्ता, सामर्थ्य और समान भागीदारी के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। ये प्रयास एनईपी 2020 की सिफारिशों के माध्यम से भारत में क्रियान्वित पिछली नीतियों में जोड़े गए हैं। एनईपी 2020 एक व्यापक ढांचा है जो देश की शिक्षा प्रणाली को जीर्णोद्धार करने का प्रयास करती है। शिक्षा में लैंगिक असमानताओं को दूर करने की तात्कालिकता को पहचानते हुए, एनईपी 2020 में महिलाओं की समान भागीदारी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कई प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके अलावा, एनईपी 2020 ने जेंडर इंक्लूजन फंड (GIF) के नाम से महिलाओं की शिक्षा के लिए एक फंड बनाने की सिफारिश की है, जिसमें पड़ोस में स्कूलों की स्थापना, आठवीं कक्षा तक की लड़कियों के लिए मुफ्त यूनिफार्म और पाठ्य-पुस्तकों का प्रावधान, महिला शिक्षकों सहित अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति, दूरस्थ/पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षकों के लिए आवासीय क्वार्टर, कक्षा 1 से कक्षा 12वीं तक विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CWSN) लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति, लड़कियों के लिए पृथक शौचालय, लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए शिक्षकों के जागरुकता कार्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों सहित लिंग-जागरुक शिक्षण-शिक्षण सामग्री, आदि शामिल हैं। इस प्रकार, एनईपी 2020 ने, सतत विकास के लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप, महिलाओं के लिए समान और समावेशी शिक्षा को गति दी है और सभी के लिए शिक्षा प्रदान करने के लिए कड़ी मेहनत की है। समतामूलक और समावेशी शिक्षा से संबंधित एनईपी 2020 की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैंः
1. प्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा (ECCE): यह नीति इस बात पर केंद्रित है कि हाशिए पर रहने वाले परिवारों की सभी लड़कियों को प्रारंभिक बचपन की उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की समान सुलभता की अत्यंत आवश्यकता है इसलिए ईसीसीई को औपचारिक स्कूल प्रणाली में एकीकृत किया जाए ताकि बचपन से ही लड़कियों का समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।
2. स्कूली शिक्षाः एनईपी 2020 स्कूलों में लिंग-उत्तरदायी शिक्षण वातावरण के विकास को बढ़ावा देती है जो विविधता का समर्थन करती है और महिलाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) और अन्य संबंधित क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए प्रेरित करती है। इस शिक्षा नीति में लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए जेन्डर संसाधन केंद्र बनाने और अतिरिक्त महिला प्रशिक्षकों को नियुक्त करने की भी बात कही गई है।
3. उच्च शिक्षाः एनईपी का लक्ष्य, विशिष्ट रूप से महिलाओं के लिए तैयार किए गए वित्तीय सहायता व परामर्श कार्यक्रमों और छात्रवृत्ति की संख्या में वृद्धि करके उच्च शिक्षा में नामांकित महिलाओं की संख्या में वृद्धि करना है। सुरक्षा के बारे में भय को दूर करने और छात्राओं का प्रतिधारण सुनिशचित करने के लिए, यह शिक्षा नीति शाला परिसर के सुरक्षित वातावरण और महिला छात्रावासों के निर्माण की भी वकालत करती है।
4. कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षणः एनईपी 2020 महिलाओं की रोजगार क्षमता और आर्थिक सशक्तिकरण के सुधार में कौशल विकास के महत्व को स्वीकार करते हुए, भारतीय शिक्षा प्रणाली में लिंग-उत्तरदायी व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को शामिल करने की बात करती है।
5. डिजिटल शिक्षाः एनईपी 2020 डिजिटल युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा में सुलभता, समानता और गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी-सक्षम शिक्षा और डिजिटल संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देती है। शिक्षण और सीखने की प्रक्रियाओं में शिक्षा 5.0 के तत्वों, जैसे मशीन लर्निंग, कृत्रिम बुद्धि और अनुकूली शिक्षण प्रौद्योगिकियों को शामिल कर के हम विकसित भारत / 2047 का निर्माण कर सकते हैं। महिलाओं को इस प्रकार की उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा तक सुलभता प्रदान करके, हम सतत विकास के लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त कर सकते हैं।
6. समता और समावेशनः एनसीईआरटी (एन.डी. अ) के अनुसार एनईपी 2020 शिक्षा में समता और समावेशन को लाने के लिए दृढ़ता से समर्पित है, जिसमें सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों, विकलांगताओं, लैंगिक असमानताओं और समाज में क्षेत्रीय असंतुलन से निपटने पर विशेष जोर दिया गया है। ऐसा करने के लिए, यह शिक्षा नीति भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित अक्षम विद्यार्थीयों के सशक्तिकरण के साथ-साथ शैक्षिक व्यवस्था में कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के लिए लिंग-संवेदनशील बुनियादी ढांचे, समावेशी शैक्षिक प्रथाओं और शैक्षिक छात्रवृत्ति के प्रावधान का आह्वान करती है।
इस प्रकार, एनईपी 2020 का लक्ष्य इक्कीसवीं सदी की आवश्यकताओं को पूरा करने, समस्याओं के समाधान करने, व लोगों, समाज और देश के समग्र विकास का समर्थन करने के लिए भारत की शैक्षिक प्रणाली को पूरी तरह से पुनर्गठित करना है। यह शिक्षा के लिए शिक्षार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करती है व अनुकूलता, स्वायत्तता, रचनात्मकता और विविधता पर जोर देती है।
बाधाओं को नियंत्रित करने की रणनीतियाँ:
समावेशी शिक्षा एक दृष्टिकोण है और शिक्षा के सभी हितधारकों के द्वारा इसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस संबंध में, सभी हितधारकों के लिए समावेशी शिक्षा में प्रशिक्षण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। महिलाओं के लिए समावेशी और न्यायसंगत शिक्षा को बढ़ावा देने में निम्नलिखित रणनीतियाँ शामिल की जा सकती हैंः
1. संवेदनशीलता और जागरूकता अभियानः यादव और सिंह (2020) के अनुसार, भारतीय समाज में माता-पिता का लैंगिक पक्षपात अभी भी स्पष्ट दिखाई देता है। समाज में गहराई तक व्याप्त लैंगिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दी जानी चाहिए और समुदाय के सदस्यों को लड़कियों की शिक्षा की महत्ता के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। स्थानीय अधिकारियों, शिक्षकों और अभिभावकों पर केन्द्रित जागरुकता अभियान छात्राओं के लिए अधिक समर्थन जुटा सकते हैं और उनकी शिक्षा के बारे में धारणाओं को बदलने में मदद कर सकते हैं।
2. क्षमता निर्माण कार्यक्रमः शिक्षकों और शैक्षिक प्रशासकों को लिंग-उत्तरदायी शिक्षण अभ्यास और समावेशी शिक्षण वातावरण बनाने पर प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। व्यावसायिक विकास के कार्यक्रमों में लिंग-संवेदनशील शिक्षाशास्त्र और अचेतन पूर्वाग्रहों पर काबू पाने पर भी जोर दिया जाना चाहिए।
3. आधारभूत ढांचे और संसाधनों में निवेशः स्कूल की सुविधाओं को उन्नत करने के लिए पर्याप्त बजट और संसाधनों को अलग रखा जाना चाहिए, जैसे कि छात्राओं के लिए पृथक शौचालय बनाना, सुरक्षित परिवहन प्रदान करना, कंप्यूटर लैब और पुस्तकालय स्थापित करना, इत्यादि। प्रौद्योगिकी तक समान सुलभता (यूनेस्को, 2024) और डिजिटल साक्षरता प्रशिक्षण भी महिलाओं और लड़कियों को शैक्षिक और आर्थिक अवसरों में आगे बढ़ाने के लिए सशक्त बना सकते हैं।
4. साझेदारी और सहयोगः लिंग-उत्तरदायी नीतियों और प्रयासों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सरकार, निजी और गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग की आवश्यकता है। यह साझेदारी उन जटिल मुद्दों से निपटने के लिए संसाधन जुटाने में, समन्वय और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान में मदद कर सकती है जिनका सामना शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएं करती हैं।
5. सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं का उन्मूलनः महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए, समाज में प्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं को योजनाबद्ध और संगठित तरीके से हटाया जाना चाहिए (साहू और अन्य, 2018)।
निष्कर्ष:
किसी भी राष्ट्र की सामाजिक और आर्थिक प्रगति को समतामूलक और समावेशी शिक्षा, जो अब एक बुनियादी मानव अधिकार भी है, के द्वारा त्वरित किया जा सकता है। किसी भी आबादी के एक बड़े हिस्से (अर्थात् महिलाओं) को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सुलभता से नजरअंदाज या वंचित नहीं किया जा सकता। यह शिक्षा वह साधन है जिसके माध्यम से महिलाएं किसी भी राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकती हैं। सतत विकास में महिलाओं की भूमिका अपरिहार्य है। इसलिए छात्राओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों में लड़कियों के नामांकन को बढ़ाने के लिए, उच्च शिक्षा संस्थानों में उचित आरक्षण को शामिल करके और उन्हें सुविधाएं प्रदान करके एक लिंग संतुलन प्रवेश प्रक्रिया सुनिश्चित की जा सकती है। इसके अलावा, पाठ्यक्रम को महिलाओं के लिए अधिक समावेशी बनाया जाना चाहिए। सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (SEDGs) को, विशेष रूप से लड़कियों के लिए मुफ्त बोर्डिंग, आवास और भोजन प्रदान किया जाना चाहिए (एनसीईआरटी, एन.डी. ब) और ‘विशेष आवश्यकता वाली लड़कियों’ के लिए सहायता, परिवहन, स्क्राइब, शिक्षण-सीखने की सामग्री, उपकरण और छात्रवृत्ति, एस्कॉर्ट्स के लिए भत्ते प्रदान किया जाना चाहिए (भारत सरकार, 2024ब). शैक्षणिक संस्थानों में उपयुक्त परामर्श और सलाह कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। संस्थानों में भेदभाव और पहचान के मुद्दों के संबंध में संकायों, परामर्शदाताओं और छात्रों के लिए जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। इसके अलावा, उत्पीड़न और भेदभाव गतिविधियों के लिए शून्य-सहिष्णुता नियम तैयार किए जाने चाहिए। एनईपी 2020 शिक्षा में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है, इसके सफल कार्यान्वयन के लिए नीति निर्माताओं, शिक्षकों, नागरिक समाज संगठनों और समुदायों सहित विभिन्न हितधारकों की ओर से संयुक्त रूप से कठोर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।
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Received on 01.05.2026 Revised on 18.06.2026 Accepted on 20.07.2026 Published on 17.08.2026 Available online from August 22, 2026 Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(3):154-162. DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00029 ©A and V Publications All right reserved
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